स्वर: देवी (Devi)
बहंगी व सूप सजाते समय, घाट यात्रा व अर्घ्य अर्पण के समय
पारंपरिक बहंगी लोकगीत
कांच ही बांस के बहंगिया (बहंगी लचकत जाय) - देवी | Kanch Hi Bans Ke Bahangiya
"कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय... होई ना बलम जी कहरिया, बहंगी घाटे पहुंचाय"
आध्यात्मिक भावार्थ एवं महिमा
लोकगायिका देवी द्वारा स्वरबद्ध 'कांच ही बांस के बहंगिया' छठ महापर्व का सर्वकालिक लोकप्रिय व हृदयस्पर्शी पारंपरिक लोकगीत है। इसमें ताजे कच्चे बांस की बहंगी में छठ मइया और सूर्यदेव के लिए पवित्र प्रसाद व फल भरकर घाट ले जाने का जीवंत व आत्मीय वर्णन है। रास्ते में जब कोई राहगीर (बटोहिया) पूछता है कि यह बहंगी किसके लिए जा रही है, तो श्रद्धा से उत्तर दिया जाता है कि यह परम पावन बहंगी साक्षात छठी मइया के चरणों में अर्पण करने जा रही है।
सांस्कृतिक परंपरा एवं संदर्भ
छठ पूजा के तीसरे व चौथे दिन संध्या अर्घ्य व उषा अर्घ्य के लिए सूप-डाला सजाकर बहंगी को कंधे पर उठाकर गंगा घाट जाने के पावन अवसर पर गाया जाने वाला अत्यंत पूज्य लोकगीत।
छठ गीत के संपूर्ण बोल (Lyrics)
कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाय
बहंगी लचकत जाय
होई ना बलम जी कहरिया,
बहंगी घाटे पहुंचाय
कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाय
बहंगी लचकत जाय
बाट जे पूछेला बटोहिया,
बहंगी केकरा के जाय
बहंगी केकरा के जाय
तू तो आन्हर होवे रे बटोहिया,
बहंगी छठ मैया के जाय
बहंगी छठ मैया के जाय
ओहरे जे बारी छठि मैया,
बहंगी उनका के जाय
बहंगी उनका के जाय
कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाय
बहंगी लचकत जाय
होई ना देवर जी कहरिया,
बहंगी घाटे पहुंचाय
बहंगी घाटे पहुंचाय
ऊंहवे जे बारि छठि मैया
बहंगी के उनके के जाय
बहंगी उनका के जाय
बाट जे पूछेला बटोहिया
बहंगी केकरा के जाय
बहंगी केकरा के जाय
तू तो आन्हर होवे रे बटोहिया
बहंगी छठ मैया के जाय
बहंगी छठ मैया के जाय
ऊंहवे जे बारी छठि मैया
बहंगी उनका के जाय
बहंगी उनका के जाय