स्वर: विशाल मिश्रा / पारंपरिक छठ लोकगीत
छठ प्रसाद व डाला तैयारी, संध्या व उषा अर्घ्य के समय
पारंपरिक छठ लोकगीत
ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से (मारबो रे सुगवा धनुख से) | Chhathi Maiya Bulaye
"ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए... मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए"
आध्यात्मिक भावार्थ एवं महिमा
छठ पूजा के सूप और डाला में भगवान सूर्य व छठी मइया को अर्पित करने वाले फलों (केला, नारियल, शरीफा, सेब, अमरूद) की पवित्रता और शुचिता का यह सबसे प्रसिद्ध पारंपरिक लोकगीत है। इसमें व्रती कहते हैं कि सूर्यदेव के प्रसाद के फलों को कोई पक्षी जूठा न करे, ताकि अगाध पवित्रता से अर्घ्य समर्पित किया जा सके।
सांस्कृतिक परंपरा एवं संदर्भ
छठ पूजा की सामग्री व प्रसाद तैयार करते समय, सूप-डाला सजाने और गंगा घाट पर अर्घ्य अर्पण के दौरान घर-घर में गाया जाने वाला परम पावन लोकगीत।
छठ गीत के संपूर्ण बोल (Lyrics)
ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय॥
ऊ जे नारियर जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय॥
अमरुदवा जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय॥
शरीफवा जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय॥
ऊ जे सेववा जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय॥
सभे फलवा जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय॥